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बाल मजदूरी: समस्याएं एवं समाधान

प्रायः हर भाषा , संस्कृति और देश में यह धारणा सामान्य रूप से पाई जाती है कि बच्चे राष्ट्र के भावी कर्णधार होते हैं , आज के बच्चों में हम आने वाले कल को देख सकते हैं । इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण है कि यदि कोई देश बाल मजदूरी की समस्या से जूझ रहा है तो उसका भविष्य निश्चित ही अंधकारमय होगा । इसके साथ ही बच्चों का भविष्य भी खराब होगा । ऐसी स्थिति में हम उस देश के अच्छे भविष्य की कल्पना कैसे कर सकते हैं ? आज विश्व के अमीर या गरीब , विकसित या विकासशील सभी देशों में बच्चों के नन्हें हाथों का प्रयोग धनोपार्जन के लिए किया जाता है । संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय बाल संकट कोष द्वारा हाल में जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार विश्व भर में 24.6 करोड़ बच्चे बाल श्रमिक के रूप में कार्य करते हैं , इनमें से 15.2 करोड़ केवल एशिया में हैं । उल्लेखनीय है कि भारत में विश्व के सर्वाधिक बाल श्रमिक हैं । यह एक अत्यंत सोचनीय प्रश्न है । चूंकि भारत एक युवा राष्ट्र है इसलिए यह स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि यही बच्चे कल ऐसे युवा के रूप में सामने होंगे जिनको संसाधन की दृष्टि से हीन माना जायेगा । 1986 के बाल - श्रम अधिनियम की अनुसूची के अंतर्गत हमारे देश में 13व्यवसायों और 57 खतरनाक प्रक्रियाओं में बच्चों से काम कराने पर प्रतिबन्ध है , परन्तु इस अधिनियम के तहत घरेलू नौकर के काम को खतरनाक नहीं मानते हुए इसे प्रतिबंधित नहीं किया गया है । परिणामस्वरूप बाल - श्रमिकों में से 10-20 प्रतिशत घरेलू नौकर हैं । इनमें से 60 प्रतिशत 10 वर्ष से कम आयु के हैं । तमिलनाडु के रामानाथपुरम जिले में शिवकाशी नामक जगह में पटाखा और माचिस बनाने में 45 हजार से अधिक बच्चे कार्यरत हैं । उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के शीशे के कारखाने में 45 हजार बच्चे और कालीन | उद्योग में एक लाख से अधिक बच्चे काम करते हैं । इसके अतिरिक्त अन्य खतरनाक क्षेत्र भी हैं जिनमें बच्चों को जबरन अथवा खराब पारिवारिक स्थिति वश कार्य करना पड़ता है । भारत जैसे विकासशील देशों में बाल - श्रम को बढ़ावा देने वाले अनेक सामाजिक - आर्थिक कारक हैं , जिनकी वजह से सरकार के प्रयास के बावजूद भी भारत में यह अभिशाप के रूप में विद्यमान है । इसके प्रमुख कारणों में है - गरीबी - इस समस्या का प्रमुख कारण हमारे देश की गरीबी है । ईश्वर सभी बच्चों को , चाहे वो अमीर हो या गरीब स्नेह औरप्यार से बनाते हैं , परन्तु यह समानता यहीं तक सीमित रह जाती है । जन्म के बाद वो दिन कभी नहीं आता , जब एक गरीब बच्चा खुद की तुलना आर्थिक रूप से सम्पन्न घरों के बच्चे से कर सके । शायद उनके जीवन में वो दिन ही नहीं आता , जब वो खुद की तुलना एक बच्चे से करे या खुद को बच्चा समझ सके । जन्म लेते ही इनका बचपन छिन जाता है और ये वयस्क की तरह रोजी - रोटी कमाने के लिए काम करने लगते हैं । अशिक्षा - हमारे देश में एक प्रमुख समस्या अशिक्षा की है जो विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं जनजाति जैसे सामाजिक - आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों में व्याप्त है । ये लोग बच्चों को शिक्षा देने के बजाय उन्हें व्यवसायिक कामों को सिखाना बेहतर समझते हैं । जनसंख्या वृद्धि - हमारे देश की जनसंख्या इतनी ज्यादा है और दिन - प्रतिदिन तेजी से बढ़ती जा रही है , जिसकी वजह से सभी को रोजगार मिलना असंभव लगता है । हमारी जनसंख्या का एक बड़ा भाग मजदूरी करके अपना गुजारा करता है । ऐसे में एक आदमी की मजदूरी से 10-12 लोगों वाले बड़े परिवार का गुजारा करना मुश्किल है । इस कारण ये अपने बच्चों को भी काम पर लगाते हैं । सस्ता बाल मजदूरी इसका एक प्रमुख कारण लोगों की सोच में गिरावट आना है । आज मनुष्य मानवता के सिद्धान्त को भूलकर विलासितापूर्ण जीवन की तरफ उन्मुख होते जा रहे हैं । यह जानते हुए कि बाल श्रम कानून एवं मानवता दोनों ही दृष्टि से अपराध है , बच्चों से काम कराते हैं क्योंकि उनसे कम पैसे में अधिक काम कराया जा सकता है । इस प्रकार स्पष्ट है कि जिस गति से भारत के विभिन्न क्षेत्रों में आजादी के पूर्व से लेकर आज तक , लाखों बच्चे विभिन्न कारणों से शोषण के शिकार हो रहे हैं उनके विरुद्ध सभी तबकों द्वारा कम से कम जन - आंदोलन की शुरुआत काफी पहले हो जानी चाहिए थी , किन्तु जन - आंदोलन की बात कौन करे , किसी क्षेत्र या तबके में बच्चों के प्रति सहानुभूति एवं गहन संवेदना भी व्यक्त नहीं की जाती । हालांकि सरकार द्वारा इस विकराल समस्या के समाधान के लिए समय - समय पर अनेक अधिनियम बनाये गये तथा योजनाएँ लाई गईं हैं । संविधान में बाल - श्रम के खिलाफ अनेक प्रावधान हैं । संविधान के अनुच्छेद 15 ( 3 ) द्वारा सरकार को बालकों के लिए अलग से कानून बनाने का अधिकार है । अनुच्छेद -23 के अनुसार बालकों के क्रय विक्रय एवं उनके द्वारा गैर - कानूनी तथा अनैतिक कार्य कराने पर रोक लगता है । अनुच्छेद -24 के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से किसी फैक्ट्री , खनन कार्य या जोखिम वाले काम को नहीं कराया जा सकता है । अनुच्छेद -39 ( नीति - निर्देशक तत्व ) बच्चों के स्वास्थ्य एवं उनके शारीरिक विकास हेतु सुविधाएं उपलब्ध कराने हेतु सरकार को निर्देश देता है । अनुच्छेद -39 ( ई ) में सरकार को बच्चों के बचपन की रक्षा करने और यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिये गये हैं कि उन्हें ऐसे कार्यों में न लगाये जायें , जो उनकी उम्र और स्वास्थ्य के लिए घातक हो । बालश्रम निरोधक विभिन्न प्रावधान इस प्रकार हैं फैक्ट्री एक्ट 1948 - किसी भी फैक्ट्री में 14 वर्ष स कम आयु के बच्चों के रोजगार के बारे में निषेधात्मक व्यवस्थाएं निर्देशित करता है ।खान एक्ट 1952 – खानों में काम करने के लिए न्यूनतम आयु 15 वर्ष निर्धारित करता है । बागान श्रम एक्ट 1951-12 वर्ष से कम आयु के बच्चों को चाय , कॉफी और रबर के बागानों में रोजगार निषेधित करता है । अनुबंधित श्रमिक अधिनियम 1975 - अनुबंधित श्रमिकों , जिसमें बच्चे भी शामिल हैं , की कार्यदशाएं , मजदूरी भुगतान तथा कल्याण सुविधाओं को निर्धारित करता है । बाल - श्रमिक अधिनियम 1986 बच्चों को कुछ व्यवसायों में प्रवेश पर रोक लगाता है और कुछ अन्य व्यवसाय प्रकारों की दशाओं का नियमितीकरण करता है । 1987 को राष्ट्रीय बालश्रम नीति के अंतर्गत बाल श्रमिकों को शोषण से बचाने , उनकी शिक्षा , चिकित्सा , मनोरंजन तथा सामान्य विकास पर जोर देने की व्यवस्था की गई है । महिलाओं और बच्चों के विकास के लिए मानव - संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत 1985 में महिला एवं बाल विकास विभाग स्थापित किया गया है । बाल - विकास हेतु सरकार ने समय | समय पर कई योजनाएँ प्रारम्भ की हैं यथा - समन्वित बाल विकास | योजना ( 1975 ) , बेसहारा बच्चों हेतु समन्वित कार्यक्रम ( 1997 ) , | राष्ट्रीय शिशु सदन योजना ( 1994 ) , मध्यान्ह योजना ( 1995 ) , | बालिका - समृद्धि योजना ( 1997 ) , किशोरी - शक्ति योजना ( 2000 ) , | स्वधारा योजना ( 2001 ) , राजीव गाँधी किशोरी अधिकारिता योजना | ( सबला ) , 19 नवम्बर , 20101 सरकार द्वारा बालश्रम को समाप्त करने तथा बच्चों के सम्पूर्ण | विकास के लिए अनेक प्रयास किए गए एवं अभी भी किए जा रहे हैं । परन्तु यदि हम इस समस्या का स्थायी समाधान चाहते हैं , तो देश के प्रत्येक नागरिक को इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाना पड़ेगा । | भारत जैसे देश में बाल श्रम की समस्या अत्यंत जटिल एवं बहुआयामी है , जिसका निदान भी बहुआयामी ही हो सकता है । | इसलिए समाज तथा राष्ट्र के नागरिक होने के नाते इस समस्या का | समाधान करना हमारा कर्तव्य भी बनता है । सचमुच इस कुप्रथा का | उन्मूलन सिर्फ सरकारी कार्यक्रमों से नहीं हो सकता । इसके लिए | समाज के सभी वर्गों तथा स्वयंसेवी संस्थाओं , बुद्धिजीवियों , पत्रकारों , | श्रमसंघों , सामाजिक कार्यकर्ताओं , शिक्षकों , सरकारी कर्मचारियों आदि | को एकजुट होकर प्रयास करना होगा । आज आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के सदस्य अपने शौक को | पूरा करने में ही लाखों रुपये खर्च करते हैं परन्तु जब किसी सामाजिक समस्या के समाधान की बात आती है तो इसे सरकार की जिम्मेदारी का रूप देकर मुंह मोड़ लेते हैं । दूसरी ओर यह भी सच है कि कुछ | परिवार और गैर सरकारी संस्था बाल विकास में लगे हैं , परंतु इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए हमें और व्यापक कदम उठाने | होंगे । बाल मजदूरी एक सामाजिक बुराई है । अतः सामाजिक | जागरूकता के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है । यदि आर्थिक रूप से सम्पन्न प्रत्येक परिवार एक अनाथ या गरीब बच्चे की | पढ़ाई एवं विकास की जिम्मेदारी ले तो हमारा देश इस समस्या को आसानी से हल कर सकता है तथा विश्व में मानवता एवं एकता का | अनूठा उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है ।

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